सोमवार, 4 अगस्त 2014
Kabir
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥
मन का अभ्यास धीरे धीरे ही संभव है, धीरे धीरे का अर्थ पूरे जीवन से है. नियमित अभ्यास ही हमारा स्वभाव बन जानना चाहिए.
2 टिप्पणियां:
दिगम्बर नासवा
5 अगस्त 2014 को 12:22 am बजे
कबीर के दोहे सदा से अच्छे लगते रहे हैं सब को ... आभार ...
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Kailash Sharma
5 अगस्त 2014 को 2:07 am बजे
प्रेरक सन्देश देता दोहा...
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